मोपला (mopla)
Part 59
किया था कि उसका हाथ पकड़ लिया गया। उसने अपने हाथ को छडाने का
असफल प्रयास किया, परन्तु भला उसे मरने कौन देता? केवल इस छीना
पटी में उसके सिर पर मोपलों की तलवार का आघात लगा था, जिससे
उसके सिर में घाव हो गया था। उस घाव से निकलता हुआ रुधिर उसके कंठ
तक बह कर आ रहा था। उन मृत पड़े मोपलों के पेट से बहे रक्त से वह
कोठरी भर गई थी। उस रक्त में उस नाग के टुकडे तड़प रहे थे। जो पांच छः ।
मोपले कोठरी में घुस आए थे वे सुमति को पकड़े खड़े थे और उन्होंने उसके
हाथ से छुरी छीन ली थी। वे इस पुष्प सी कोमल कन्या को फूल के समान
मसलने लग गये थे। ऐसी विकट स्थिति थी और चारों ओर फैले रक्त ने स्थिति
की बीभत्सता को और भी अधिक बढ़ा दिया था।
'फजल! देखता क्या है !' एक मोपला सुमति के दोनों हाथों को, जो ऊपर
की ओर उठे हुए थे, पकड़े खड़ा हुआ अपने साथी से कह रहा था। अरे कल
उस झाड़ी से यही पखेरू अपने साथ आया था। परन्तु ऐटखान ने बीच में ही
धोखा दे दिया। अब देखता क्या है अन्यथा यदि उस मौलवी की टोली के
मौलवी के कब्जे में पहुंच जाएगी। तुम फिर मक्खियां मारते रह जाओगे।' ऐसा
लोग एक बार यहां आ पहुंचे तो वे इस छबीली को उठा लेंगे और फिर यह
कहते हुए उस उन्मत्त ने सुमति के रक्त से सने कपोलों का चुम्बन लिया ' अरे
यार, मेरे वास्ते भी रख !' इस प्रकार उच्छृखल विनोद करते हुए ये पांच-छ:
पशु नितान्त कामोन्मित्त होकर घायल कन्या से लिपट गए।
समाज की सुव्यवस्थित अवस्था में मानव के मनोविकार मर्यादित और
दबे रहते हैं। उसमें एक प्रकार का असन्तोष भी निहित होता है। राक्षसी प्रवृत्ति
के लोगों में ये मनोविकार जितने उग्र होते हैं, उनमें असन्तोष भी उतना ही
अधिक होता है। पाशविक वृत्ति के समाज में जब कभी विप्लव होता है तो यह
दुष्ट और तामसी प्रवृत्ति और भी अधिक खुलकर खेलती है। इससे उनके
कामुक विकारों को शान्ति नहीं हो पाती अपितु वे और भड़क उठते हैं। वह
कन्या रक्त से सराबोर, बेहाल थी, बिलबिला रही थी। किन्तु कामुकता के इन
जीवित पुतलों का इन्द्रियोन्माद और भी अधिक बढ़ गया था-'अरे यार इस
साली ने दो मुसलमानों को यहीं मार डाला है। इसलिये इससे अच्छी तरह
प्रतिशोध लेना चाहिए। हां, जी भर के प्रतिशोध लेना चाहिए।' इस प्रकार कहते
तथा खो-खों करके हांफते हुए इन नर-पशुओं ने इस कन्या से भयंकर बलात्कार
करना आरम्भ कर दिया था। एक नहीं दो दो, तीन-तीन नराधमों ने बदला लो'
